- रक्षा निर्यात ने बनाया नया रिकॉर्ड
- टी-90 अपग्रेड से नए बाजार
- निजी क्षेत्र बना निर्यात का इंजन
भारत तेजी से एक प्रमुख वैश्विक रक्षा निर्यातक के रूप में उभर रहा है। वर्ष 2025-26 में रक्षा उत्पादन करीब 18.6 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जबकि रक्षा निर्यात में 63 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई और यह बढ़कर 4.6 अरब डॉलर हो गया।
भारत का रक्षा निर्यात अब केवल गोला-बारूद और सुरक्षा उपकरणों तक सीमित नहीं है। ब्रह्मोस मिसाइल, आकाश वायु रक्षा प्रणाली, पिनाका रॉकेट लॉन्चर, ATAGS तोप, रडार, हेलीकॉप्टर, नौसैनिक पोत और ड्रोन जैसे अत्याधुनिक उत्पाद भी विदेशी बाजारों में पहुंच रहे हैं। फिलीपींस ब्रह्मोस का पहला विदेशी खरीदार बना, जबकि इंडोनेशिया और वियतनाम समेत कई देशों ने इसमें रुचि दिखाई है।
भारत अब टी-90 टैंकों के आधुनिकीकरण को भी निर्यात के नए अवसर के रूप में देख रहा है। भारतीय अपग्रेड पैकेज में आधुनिक थर्मल साइट, डिजिटल फायर-कंट्रोल सिस्टम, बेहतर सुरक्षा और गतिशीलता जैसी सुविधाएं शामिल हैं। इससे पुराने टी-90 बेड़े वाले देशों को नए टैंक खरीदने के बजाय मौजूदा टैंकों को आधुनिक बनाने का किफायती विकल्प मिल सकता है।
एयरोस्पेस क्षेत्र भी भारत की बढ़ती रक्षा विनिर्माण क्षमता का अहम हिस्सा बन रहा है। भारत हर साल करीब 2 अरब डॉलर के विमान कलपुर्जों का निर्यात करता है। भारतीय कंपनियां F-16, अपाचे, चिनूक, बोइंग 737 और 787 जैसे विमानों के लिए जटिल संरचनात्मक हिस्से और उप-प्रणालियां तैयार कर रही हैं।
इस बदलाव में निजी क्षेत्र की भूमिका तेजी से बढ़ी है। टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, एलएंडटी, महिंद्रा डिफेंस, भारत फोर्ज, अडाणी डिफेंस, डेटा पैटर्न्स और एस्ट्रा माइक्रोवेव जैसी कंपनियां मिसाइल, रडार, एवियोनिक्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और एयरोस्पेस निर्माण में अपनी क्षमता बढ़ा रही हैं। निजी क्षेत्र ने रक्षा निर्यात के कुल मूल्य में करीब 45 प्रतिशत योगदान दिया है।
हालांकि, भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती लाइसेंस आधारित उत्पादन से स्वदेशी बौद्धिक संपदा की ओर बढ़ना है। रक्षा क्षेत्र में वैश्विक तकनीकी ताकत हासिल करने के लिए अनुसंधान एवं विकास, घरेलू पेटेंट, सॉफ्टवेयर और मौलिक डिजाइन में निवेश बढ़ाना जरूरी होगा। इससे भारत केवल विदेशी तकनीक का निर्माता नहीं, बल्कि स्वदेशी रक्षा तकनीक का वैश्विक निर्यातक बन सकेगा।


