बिहार विधानसभा चुनावों का परिणाम आते ही भारतीय राजनीति का एक दिलचस्प दृश्य उजागर हुआ—भाजपा ने जश्न मनाने के बजाय अगले ही दिन पश्चिम बंगाल की ओर रुख कर लिया। यह कदम केवल राजनीतिक फुर्ती नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित, अनुशासित और निरंतर सक्रिय चुनावी मशीन का संकेत है, जो केवल चुनाव जीतने के लिए नहीं, बल्कि चुनाव को जीने के लिए बनाई गई है।
भारतीय राजनीति में भाजपा की यही सबसे बड़ी ताकत तथा विपक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी बनकर उभरती है।
भाजपा का चुनावी मॉडल: चार शब्दों में पूरी रणनीति
भारतीय जनता पार्टी की चुनावी सफलता को केवल चार शब्दों में समझा जा सकता है—
मेहनत, संगठन, अनुशासन और निरंतरता।
इन चार स्तंभों पर आधारित मॉडल भाजपा को अन्य दलों से कई कदम आगे खड़ा करता है।
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मेहनत—बूथ से लेकर शीर्ष नेतृत्व तक लगातार सक्रियता।
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संगठन—देशभर में जड़ें जमाए हुए लाखों कार्यकर्ता, जिन्हें नियमित प्रशिक्षण और दिशानिर्देश मिलते हैं।
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अनुशासन—नेतृत्व के आदेश तुरंत नीचे तक लागू, बयानबाज़ी नियंत्रित, और कार्यक्रम समयबद्ध।
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निरंतरता—चुनाव जीत जाएँ या हार जाएँ, अभियान कभी रुकता नहीं।
इसके उलट अधिकांश विपक्षी दल चुनाव को छह महीने का प्रोजेक्ट समझकर तैयारी करते हैं। पोस्टर बदलना, भाषण तैयार करना और रैलियों का आयोजन शुरू कर देते हैं। यही कारण है कि उनके चुनाव अभियान असंगठित और अव्यवस्थित दिखते हैं।
चुनाव: इवेंट या इकोसिस्टम?
यही वह मूलभूत भेद है जो भाजपा को विपक्ष से अलग करता है। विपक्ष जहाँ चुनाव को “इवेंट” मानता है, भाजपा उसे एक व्यापक इकोसिस्टम की तरह देखती है। यह इकोसिस्टम तीन से चार वर्ष पहले से ही बूथ स्तर तक सक्रिय हो जाता है—
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बूथवार सूक्ष्म डेटा ,जातीय और सामाजिक क्लस्टरों का अध्ययन ,स्थानीय नेटवर्क का विस्तार ,महिलाओं और युवाओं की आवश्यकताओं की पहचान ,धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से सामाजिक जुड़ाव ,पंचायत स्तर तक स्थायी संपर्क सूत्र
इसी लंबी योजना का परिणाम है कि भाजपा के लिए हार भी एक अभियान बन जाती है, जबकि दूसरी ओर विपक्ष जीत के बाद भी बिखरा हुआ दिखाई देता है। इसे ही कहते हैं—राजनीति का वैज्ञानिक दृष्टिकोण।
बिहार के बाद बंगाल—योजना की निरंतरता का उदाहरण
बिहार में बड़ी जीत हासिल करने के बावजूद भाजपा ने न तो बड़े उत्सव किए और न ही आत्मसंतुष्टि में डूबी।
वो अगले ही दिन पश्चिम बंगाल की ओर मोड़ गई—यह संदेश बेहद स्पष्ट था कि भारतीय राजनीति में अब जुनून नहीं, रणनीति निर्णायक है। हरियाणा के नेता बंगाल में, राजस्थान के नेता बंगाल में, और राष्ट्रीय स्तर के कई बड़े चेहरे लगातार बंगाल दौरों पर भेजे जा रहे हैं।
इससे यह स्पष्ट होता है कि भाजपा किसी भी राज्य को अलग-थलग चुनावी अखाड़ा नहीं मानती, बल्कि राष्ट्रीय विचारधारा की श्रृंखला का एक आवश्यक हिस्सा मानती है।
पश्चिम बंगाल: 2025 का सबसे बड़ा राजनीतिक रणक्षेत्र
पश्चिम बंगाल की राजनीति पर इस समय पूरे देश की निगाहें टिकी हुई हैं।
कारण है—
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कुल 294 विधानसभा सीटें
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धार्मिक-सामाजिक जनसंख्या का जटिल वितरण
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TMC के साथ भाजपा की सीधी प्रतिस्पर्धा
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ममता बनर्जी की कमजोर होती पकड़
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राष्ट्रीय राजनीति में बंगाल का बढ़ता महत्व
पश्चिम बंगाल की 294 सीटों का धार्मिक-सांख्यिकीय ढांचा इस प्रकार है—
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150 सीटें – लगभग 80% हिन्दू (20% मुस्लिम)
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59 सीटें – 66–80% हिन्दू
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31 सीटें – 51–65% हिन्दू
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54 सीटें – 25–50% हिन्दू (50–75% मुस्लिम)
यह गणित बताता है कि भाजपा के लिए अवसर व्यापक हैं, बशर्ते वोटों को एक दिशा में मोड़ा जा सके।
पिछले चुनावी परिणाम और चुनौती
2021 के विधानसभा चुनाव परिणामों पर नज़र डालें—
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TMC – 47% वोट, 213 सीटें
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BJP – 38% वोट, 77 सीटें
बंगाल में सत्ता परिवर्तन के लिए भाजपा को लगभग 5–6% अतिरिक्त वोट की आवश्यकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में यह लक्ष्य न तो अत्यधिक कठिन है और न ही असंभव।
कारण— ममता सरकार के खिलाफ असंतोष,सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार और दलाल तंत्र की शिकायतें ,प्रशासनिक अव्यवस्था ,TMC के भीतर गुटबाज़ी ,युवाओं में बढ़ती बेरोज़गारी ,भाजपा के कैडरों की लगातार सक्रियता ,हिन्दू समाज में बढ़ती राष्ट्रवादी चेतना
इस संयोजन ने बंगाल में राजनीतिक लड़ाई को पहले से अधिक खुला और प्रतिस्पर्धी बना दिया है।
मुस्लिम वोटबैंक और AIMIM का प्रभाव
बंगाल में मुस्लिम समुदाय लगभग 27–30% की हिस्सेदारी रखता है।
यह परंपरागत रूप से ममता बनर्जी का सबसे मजबूत वोटबैंक रहा है।
भाजपा जानती है कि इस वोट को सीधे अपने पक्ष में लाना कठिन है, परंतु इसे विभाजित करके TMC की पकड़ कमजोर की जा सकती है। यहीं AIMIM की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
यदि असदुद्दीन ओवैसी पश्चिम बंगाल में अधिक सीटों पर उतरते हैं, तो मुस्लिम वोटों का विभाजन भाजपा को स्वाभाविक लाभ पहुँचा सकता है।
यह राजनीति का गणित है और भारतीय चुनावों में विगत वर्षों में इस तरह की परिस्थितियाँ अक्सर निर्णायक सिद्ध हुई हैं।
बंगाल का हिन्दू समाज—क्यों निर्णायक?
बंगाल का हिन्दू समाज—
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विचारशील
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सांस्कृतिक रूप से समृद्ध
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राजनीतिक रूप से जागरूक
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और कई बार Hyper Nationalist प्रवृत्ति वाला माना जाता है।
कोलकाता और उपनगरों से लेकर उत्तर बंगाल तक एक राष्ट्रवादी लहर पिछले कुछ वर्षों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
राम मंदिर आंदोलन, विपक्ष पर भ्रष्टाचार के आरोप, और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों ने इस समाज को भाजपा की ओर आकर्षित किया है।
यदि यह समाज संगठित होकर बूथों तक पहुँचता है, तो चुनावी परिणाम बदले बिना नहीं रह सकते।
बीजेपी की जमीनी रणनीति—घर-घर तक पहुँच
भाजपा बंगाल में निम्नलिखित पर केंद्रित है—
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घर-घर संपर्क अभियान
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महिला मतदाताओं के लिए विशेष कार्यक्रम
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युवाओं के लिए नौकरी और कौशल विकास के वादे
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SC/ST समुदायों तक पहुँच
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धार्मिक-सांस्कृतिक पर्वों में सक्रिय भागीदारी
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स्थायी बूथ समितियों का निर्माण
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केंद्रीय योजनाओं का प्रचार—प्रधानमंत्री आवास, उज्ज्वला, आयुष्मान आदि
यह सब वर्षभर चलता है, चाहे चुनाव हों या नहीं।
टर्निंग पॉइंट: क्या इस बार बंगाल बदलने को तैयार है?
बंगाल की राजनीति इस समय अपने सबसे संवेदनशील मोड़ पर है।
2025 का चुनाव यह तय कर सकता है कि—
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क्या बंगाल में TMC की तीसरी पीढ़ी भी सत्ता टिकाए रखेगी,
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भाजपा पहली बार सत्ता के शिखर को छुएगी?
यदि भाजपा इस चुनाव में निर्णायक बढ़त बना लेती है, तो यह केवल बंगाल का परिवर्तन नहीं होगा— बल्कि पूर्वी भारत की राजनीति का नक्शा ही बदल जाएगा।
चुनावी यथार्थ: जो जनता के बीच रहता है, वही जीतता है
इस समूचे परिदृश्य का अंतिम संदेश बहुत स्पष्ट है—
भारत में चुनाव वही पार्टी जीतती है, जो नारों से नहीं, बल्कि निरंतर उपस्थिति से जनता का विश्वास जीतती है।
भाजपा जनता से—
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मिलती है
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सुनती है
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डेटा एकत्र करती है
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उसे विश्लेषित करती है
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और फिर रणनीति बनाती है
विपक्ष के पास न तो यह व्यवस्था है, न अनुशासन, न ही इतनी व्यापक कैडर शक्ति।
वजह यही है कि भाजपा राजनीतिक मशीन की तरह चलती है, जबकि विपक्ष अक्सर चुनाव आने पर ही सक्रिय दिखाई देता है।


