- बेदखली के बाद रोजी-रोटी की चिंता
- सरकार की जिम्मेदारी पर जोर
- पुनर्वास बने स्थायी समाधान का आधार
कोलकाता। तृणमूल कांग्रेस के स्थापना दिवस समारोह में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी ने सड़क किनारे कारोबार करने वाले हॉकर्स के पुनर्वास को लेकर सरकार की जिम्मेदारी रेखांकित की। उन्होंने कहा कि यदि बेदखली के बाद सरकार हॉकर्स को दोबारा रोजगार के लिए उचित स्थान उपलब्ध कराने में सक्षम नहीं है, तो प्रभावित हॉकर्स को हर महीने 25 हजार रुपये मुआवजा दिया जाना चाहिए। मुख्यमंत्री के इस बयान ने रोजी-रोटी, पुनर्वास और मानवीय संवेदनशीलता से जुड़े सवालों को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
ममता बनर्जी ने कहा कि किसी व्यक्ति को उसके रोजगार के साधन से हटाना केवल प्रशासनिक कार्रवाई का विषय नहीं है, बल्कि उसके परिवार की आजीविका से भी जुड़ा प्रश्न है। इसलिए यदि सड़क और सार्वजनिक स्थानों को अतिक्रमण से मुक्त कराने के लिए हॉकर्स को हटाया जाता है, तो उनके पुनर्वास की जिम्मेदारी भी सरकार को गंभीरता से निभानी चाहिए।
बेदखली के बाद रोजी-रोटी की चिंता
शहरों में बड़ी संख्या में लोग फुटपाथ, सड़क किनारे और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर छोटे कारोबार के माध्यम से अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं। सब्जी, फल, कपड़े, भोजन और दैनिक उपयोग की वस्तुओं का कारोबार करने वाले इन छोटे विक्रेताओं के लिए यही स्थान उनकी आय का मुख्य साधन होता है।
प्रशासन की ओर से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई होने पर कई बार इन लोगों के सामने अचानक रोजगार का संकट खड़ा हो जाता है। ऐसे में पुनर्वास की व्यवस्था नहीं होने पर परिवार की आर्थिक स्थिति प्रभावित होती है। मुख्यमंत्री ने इसी मानवीय पक्ष को सामने रखते हुए कहा कि सरकार को प्रभावित लोगों के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
सरकार की जिम्मेदारी पर जोर
ममता बनर्जी के बयान का मूल संदेश यही है कि विकास और व्यवस्था सुधार की प्रक्रिया में कमजोर वर्ग की आजीविका की अनदेखी नहीं होनी चाहिए। यदि सार्वजनिक स्थानों को व्यवस्थित करने के लिए हॉकर्स को हटाया जाता है, तो उनके लिए वैकल्पिक व्यवस्था तैयार करना भी प्रशासन की जिम्मेदारी होनी चाहिए।
उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि सरकार पुनर्वास नहीं कर सकती, तो प्रभावित हॉकर्स को 25 हजार रुपये प्रतिमाह की आर्थिक सहायता दी जानी चाहिए। यह प्रस्ताव उन परिवारों के लिए राहत का माध्यम बन सकता है, जिनकी आय सीधे तौर पर छोटे कारोबार पर निर्भर है।
व्यवस्था और संवेदना में संतुलन जरूरी
हॉकर्स का मुद्दा केवल अतिक्रमण हटाने या सड़क खाली कराने तक सीमित नहीं है। इसके साथ शहर की यातायात व्यवस्था, पैदल यात्रियों की सुविधा, सार्वजनिक स्थानों के उपयोग और हजारों परिवारों की आजीविका भी जुड़ी हुई है। इसलिए समाधान ऐसा होना चाहिए जिसमें शहर के विकास के साथ गरीब और छोटे कारोबारियों के हितों की भी रक्षा हो।
भारतीय परंपरा में ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का भाव केवल धार्मिक विचार नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन का मार्गदर्शन भी करता है। शासन व्यवस्था में भी यही भावना दिखाई दे तो विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंच सकता है। सड़कें और सार्वजनिक स्थान व्यवस्थित रखना जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक यह सुनिश्चित करना भी है कि किसी गरीब परिवार के सामने दो वक्त की रोटी का संकट न खड़ा हो।
पुनर्वास बने स्थायी समाधान का आधार
विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों के बीच लंबे समय से यह विचार रहा है कि हॉकर्स की समस्या का स्थायी समाधान केवल बेदखली नहीं, बल्कि नियोजित पुनर्वास और व्यवस्थित वेंडिंग व्यवस्था के माध्यम से किया जाना चाहिए। निर्धारित स्थान, पहचान, मूलभूत सुविधाएं और स्पष्ट नियम छोटे कारोबारियों तथा प्रशासन दोनों के लिए बेहतर व्यवस्था तैयार कर सकते हैं।
ममता बनर्जी का बयान इसी व्यापक बहस को राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर फिर सामने लाता है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार हॉकर्स के पुनर्वास, वैकल्पिक रोजगार और आर्थिक सुरक्षा को लेकर किस प्रकार की ठोस व्यवस्था करती है। विकास तभी सार्थक माना जाएगा, जब उसके साथ व्यवस्था भी हो और संवेदना भी।


