चातुर्मास प्रवचन में आत्मनिरीक्षण, दृष्टिकोण परिवर्तन और आत्मजागरण का दिया प्रेरक संदेश, कहा—रोज़ पाँच मिनट स्वयं को जानने में लगाएँ, जीवन बदल जाएगा।
हिन्द सागर प्रलोका, बेंगलुरु संवाददाता विपिन कुमार जैन |
बेंगलुरु, 23 जुलाई | मनुष्य अपने जीवन की अधिकांश समस्याओं का समाधान बाहर की दुनिया में खोजता है, जबकि उनके उत्तर उसके अपने मन के भीतर ही छिपे होते हैं। जब व्यक्ति स्वयं को जानने, अपने विचारों को समझने और अपने मन का निष्पक्ष निरीक्षण करने लगता है, तभी उसके जीवन में वास्तविक परिवर्तन का आरंभ होता है। यही संदेश पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 वीर सागर महाराज ने श्री ज्ञानोदय दिगंबर जैन मंदिर, तुबरहल्ली में आयोजित चातुर्मास प्रवचनमाला के अंतर्गत श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए दिया।
‘Know Your Mind – अपने मन को जानो’ विषय पर आधारित अपने प्रेरक एवं आध्यात्मिक प्रवचन में मुनि श्री ने कहा कि संसार को बदलने का प्रयास करने से पहले व्यक्ति को अपने मन को समझना चाहिए। जीवन की दिशा और दशा बाहरी परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि हमारे विचार, हमारी दृष्टि और हमारा अंतर्मन तय करता है। यदि मन शुद्ध, संतुलित और सकारात्मक हो जाए तो जीवन स्वयं ही आनंदमय बन जाता है।
उन्होंने आचार्य कुंदकुंद देव के अमूल्य वचन “जो एकम जानदि सो सब्वं जानदि” का उल्लेख करते हुए कहा कि जो स्वयं को जान लेता है, वह समस्त जीवन के सत्य को जान लेता है। आत्मा तक पहुँचने का सबसे निकट मार्ग मन से होकर गुजरता है। इसलिए मन को पढ़ना, समझना और उसका प्रतिदिन अवलोकन करना प्रत्येक व्यक्ति का प्रथम आध्यात्मिक कर्तव्य है।
मुनि श्री ने कहा कि आज का मनुष्य बाहरी उपलब्धियों के पीछे दौड़ते-दौड़ते स्वयं से दूर होता जा रहा है। वह दूसरों की कमियों को देखने में इतना व्यस्त रहता है कि अपने भीतर झाँकने का समय ही नहीं निकाल पाता। यदि व्यक्ति प्रतिदिन कुछ समय अपने विचारों, व्यवहार और भावनाओं का शांत मन से निरीक्षण करे, तो उसके भीतर छिपी अनेक कमजोरियाँ स्वतः सामने आने लगेंगी और उन्हें दूर करने की शक्ति भी विकसित होगी।
उन्होंने महाभारत का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि दुर्योधन को पूरे गाँव में एक भी अच्छा व्यक्ति दिखाई नहीं दिया, जबकि युधिष्ठिर को एक भी बुरा व्यक्ति नहीं मिला। इसका कारण संसार नहीं, बल्कि दोनों की दृष्टि थी। उन्होंने कहा कि संसार वैसा नहीं होता जैसा वह वास्तव में है, बल्कि वैसा दिखाई देता है जैसी हमारी सोच और दृष्टि होती है। इसलिए यदि दृष्टि बदल जाए तो पूरी सृष्टि बदली हुई प्रतीत होने लगती है।
जीवन रूपांतरण को अत्यंत सरल उदाहरण से समझाते हुए मुनि श्री ने अंडे का उल्लेख किया। उन्होंने कहा, “यदि अंडा बाहर से टूटता है तो जीवन समाप्त हो जाता है, लेकिन जब वही अंडा भीतर की शक्ति से टूटता है तो नए जीवन का जन्म होता है।” इसी प्रकार मनुष्य का वास्तविक विकास भी तभी संभव है जब परिवर्तन भीतर से उत्पन्न हो। बाहरी परिवर्तन क्षणिक होते हैं, जबकि भीतर का जागरण जीवनभर साथ रहता है।
उन्होंने कहा कि आज समाज में अधिकांश लोग दूसरों को बदलने का प्रयास करते हैं, लेकिन स्वयं को बदलने की इच्छा बहुत कम दिखाई देती है। जबकि आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत आत्मस्वीकार से होती है। जो व्यक्ति स्वयं की कमियों को स्वीकार कर उन्हें सुधारने का साहस करता है, वही सच्चे अर्थों में प्रगति करता है। आत्मस्वीकार से आत्मविश्वास बढ़ता है और आत्मविश्वास से जीवन में करुणा, क्षमा, प्रेम तथा सकारात्मकता का विकास होता है।
मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य को प्रतिदिन स्वयं से कुछ प्रश्न अवश्य पूछने चाहिए—आज मैंने किसके प्रति अच्छा व्यवहार किया? किस बात पर क्रोध आया? किस क्षण अहंकार जागा? कहाँ मैंने किसी का मन दुखाया? और कहाँ मैं बेहतर बन सकता था? यही प्रश्न आत्मनिरीक्षण का आधार बनते हैं और व्यक्ति को धीरे-धीरे आत्मजागरण की ओर ले जाते हैं।
प्रवचन के अंत में उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से प्रतिदिन रात्रि में पाँच से दस मिनट आत्मचिंतन और आत्मनिरीक्षण करने का संकल्प कराया। उन्होंने प्रेरित किया कि प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर छिपे ‘युधिष्ठिर’ और ‘दुर्योधन’ को पहचानने का प्रयास करे। जब व्यक्ति अपने भीतर के सद्गुणों को विकसित और दुर्गुणों को नियंत्रित करना सीख जाता है, तब उसका जीवन स्वतः शांत, संतुलित और सफल बनने लगता है।
उन्होंने कहा कि यदि प्रत्येक परिवार का प्रत्येक सदस्य प्रतिदिन कुछ समय अपने मन को समझने में लगाए, तो केवल व्यक्ति ही नहीं, परिवार, समाज और राष्ट्र के वातावरण में भी सकारात्मक परिवर्तन स्पष्ट दिखाई देने लगेगा। आत्मपरिवर्तन ही समाज परिवर्तन का सबसे प्रभावी और स्थायी मार्ग है।
ज्ञानोदय परिवार जैन समाज के तत्वावधान में आयोजित इस चातुर्मास प्रवचन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। पूरे वातावरण में आध्यात्मिक ऊर्जा, आत्मचिंतन और साधना की भावना का विशेष संचार दिखाई दिया। श्रद्धालुओं ने मुनि श्री के प्रेरणादायी विचारों को गंभीरता से आत्मसात किया और नियमित आत्मनिरीक्षण का संकल्प लिया।
मुनि श्री 108 वीर सागर महाराज का ‘अपने मन को जानो’ संदेश केवल एक आध्यात्मिक प्रवचन नहीं, बल्कि आधुनिक जीवन की व्यस्तता, तनाव और मानसिक अशांति के बीच आत्मजागरण का एक व्यावहारिक सूत्र बनकर उभरा। उनका यह संदेश प्रत्येक व्यक्ति को यह प्रेरणा देता है कि जीवन में स्थायी सुख, शांति और सफलता का मार्ग बाहर नहीं, बल्कि अपने ही अंतर्मन से होकर गुजरता है।