- मायके की परंपरा मां-बाबूजी के साथ छूटी
- बेटी ने मां के लिए फिर खोला मायका
- साड़ी में मिला माता-पिता का प्यार
तीज का त्योहार विभा के लिए हमेशा मायके की यादों से जुड़ा रहा। शादी के बाद हर साल उसकी मां तीज पर प्यार से साड़ी भेजती थीं। कभी मां अपनी पसंद की साड़ी चुनतीं तो कभी पिता कहते कि बेटी के लिए कुछ अच्छा लेना। साड़ी के साथ माता-पिता का स्नेह भी विभा तक पहुंचता था।
समय बदला और मां के बाद पिता भी नहीं रहे। भाई-भाभी ने कुछ वर्षों तक परंपरा निभाई, लेकिन धीरे-धीरे तीज पर मायके से साड़ी आनी बंद हो गई। विभा ने भी किसी से शिकायत नहीं की और मन को समझा लिया।
एक साल तीज से ठीक पहले अचानक उसके घर कुरियर पहुंचा। पैकेट खोलने पर सुंदर साड़ी निकली और साथ में बेटी रानी की चिट्ठी थी। रानी ने लिखा कि अब उसका घर ही मां का मायका है और वह हर तीज पर अपनी मां को साड़ी भेजेगी। उसने साड़ी को नाना-नानी की याद और अपना प्यार बताया।
चिट्ठी पढ़कर विभा की आंखें नम हो गईं। उसे एहसास हुआ कि मायका केवल एक घर नहीं, बल्कि वह अपनापन है जहां बेटी बिना संकोच अपना मन रख सके। मां-बाबूजी के जाने के बाद उसका मायका खत्म नहीं हुआ था, बस उसकी बेटी ने उसका पता बदल दिया था।
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