- नेपाल-चीन सीमा पर तबाही
- हिमालय पर बढ़ता खतरा
- अर्ली वार्निंग सिस्टम जरूरी
नेपाल-चीन सीमा के पास ग्लेशियर टूटने और अचानक आई बाढ़ ने हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते पर्यावरणीय खतरों को उजागर किया है।
संयुक्त राष्ट्र के जलवायु प्रमुख साइमन स्टील ने हिंदू कुश हिमालय को जलवायु परिवर्तन के प्रति बेहद संवेदनशील बताया।
उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक और स्थानीय समुदाय लंबे समय से इस क्षेत्र में बढ़ते जलवायु जोखिमों को लेकर चेतावनी देते रहे हैं।
JNN, नई दिल्ली। तिब्बत में हिमस्खलन के बाद नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ भारत के लिए भी बड़ी चेतावनी है।
तिब्बत उसी हिमालयी क्षेत्र का हिस्सा है, जिससे भारत का सदियों पुराना भौगोलिक और सांस्कृतिक संबंध रहा है।
यदि बाढ़ का पानी थोड़ा भी भारत की ओर मुड़ता, तो इसका असर देश की सीमाओं के भीतर भी गंभीर हो सकता था।
जलवायु परिवर्तन और तेजी से हो रहा बुनियादी ढांचा विकास हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव बढ़ा रहे हैं।
हिमालय में 2,000 से अधिक ग्लेशियर झीलें मौजूद हैं, जिनसे भविष्य में बड़ी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बना हुआ है।
इन झीलों की रियल-टाइम निगरानी और समय रहते चेतावनी जारी करना बेहद जरूरी है।
भारत मौसम विज्ञान और अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
ऐसे में यह जांचना जरूरी है कि प्राकृतिक आपदाओं की समय रहते पहचान करने वाली हमारी निगरानी व्यवस्था कितनी मजबूत है।
प्रभावी अर्ली वार्निंग सिस्टम से संभावित नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।


