कश्मीर संवाद | विशेष लेख,आज 25 जून है — वह दिन, जिसे भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में आपातकाल की काली छाया के रूप में याद किया जाता है। लेकिन यह दिन एक और भयानक स्मृति को भी साथ लिए हुए है — एक ऐसी स्मृति, जो हमारी आत्मा को झकझोर देती है; गिरिजा टिक्कू की निर्मम हत्या।
गिरिजा टिक्कू: एक मासूम शिक्षिका, एक क्रूर षड्यंत्र की शिकार
गिरिजा टिक्कू, बारामूला जिले के अरिगाम गांव की एक लैब सहायिका, जिनकी सिर्फ एक “धार्मिक पहचान” थी — एक हिन्दू महिला होना। उस भयावह दौर में, जब कश्मीरी पंडितों पर संगठित और मजहबी हिंसा का नंगा नाच चल रहा था, उन्हें झूठे आश्वासन देकर वापस घाटी बुलाया गया। वेतन लेने के नाम पर उन्हें स्कूल बुलाया गया। लौटते वक़्त वे अपनी एक मुस्लिम सहकर्मी के घर गईं, वहीं से उनका अपहरण कर लिया गया। गाँव की नज़रों के सामने एक मासूम महिला को उठा लिया गया — लेकिन कोई आवाज़ नहीं उठी।

जिस्म को लकड़ी समझ कर चीर दिया गया… जिंदा ही!
गिरिजा टिक्कू के साथ जो हुआ, वह सभ्यता और इंसानियत की सबसे बड़ी पराजय है। उन्हें जिंदा इलेक्ट्रिक आरी से चीर दिया गया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में स्पष्ट हुआ कि जब आरी चल रही थी — तब गिरिजा साँसें ले रही थीं। यह कोई दुर्घटना नहीं थी — यह धार्मिक कट्टरता और नफरत की योजनाबद्ध हत्या थी। “काफिर” कहकर जो उनके साथ किया गया, वह आज भी इतिहास के पन्नों से ज्यादा ज़रूरत हमारे सामूहिक विवेक में दर्ज होने की है।
साहित्य और विमर्श की चुप्पी — संवेदनहीनता की पराकाष्ठा –
इतिहास में दर्ज यह निर्ममता आज भी हिन्दी साहित्य, मीडिया और अकादमिक विमर्श में स्थान नहीं पा सकी। नारी अधिकारों पर बोलने वाले मंच, विदेशों में औरतों के संघर्षों पर किताबें लिखने वाली कलमकाराएं गिरिजा की पीड़ा पर मौन हैं। डॉ. दिलीप कौल की कविता इस मौन को तोड़ती है — “गिरिजा को काटा ही इसीलिए गया था कि पीढ़ियों तक बहती रहे यह पीड़ा…”यह याद सिर्फ एक महिला की नहीं — यह याद चेतना की है आज का दिन हमसे मौन नहीं, संवेदना और न्याय की मांग करता है। गिरिजा टिक्कू न्याय की प्रतीक्षा में हैं — इतिहास में, मन में और व्यवस्था में। 25 जून केवल आपातकाल के विरोध का दिन नहीं — यह उस महिला का भी स्मृति-दिन है जिसे उसकी धार्मिक पहचान के कारण मौत से भी बदतर हश्र दिया गया। गिरिजा टिक्कू को विमर्श में लाएं, न्याय के स्वर में उन्हें पुकारें। पीड़ा को छिपाना नहीं, स्वीकारना सीखें।
क्योंकि —”जिस समाज में नारी की चीख दबा दी जाती है, वहाँ लोकतंत्र नहीं, केवल अंधेरा बचता है।


