हिन्द सागर प्रालोका, हैदराबाद
लोकतंत्र में संवाद का मूल तत्व यह है कि नीति-निर्माण सभी हितधारकों की आवाज़ को स्थान दे सके। इस संदर्भ में ‘लॉबिंग’ और ‘जनसंपर्क’ (पीआर) जैसे शब्द नीति-निर्माण और लोकतंत्र में बेहद अहम स्थान रखते हैं। अमेरिका में यह अवधारणा 1800 के दशक में तब जानी-पहचानी बनने लगी, जब नीति-निर्माताओं तक अपनी बात पहुंचाने के लिए संगठन और व्यक्ति ‘लॉबी’ यानी सत्ता के गलियारों में सक्रिय रहते थे। तब से यह प्रक्रिया विकसित होकर पेशेवर लॉबिंग में बदल चुकी है, जो नीति-निर्माण और लोकतंत्र को प्रभावित करने का प्रमुख साधन बन गया है।
भारत में लॉबिंग का वर्तमान संदर्भ:
भारत में लॉबिंग को लेकर अब तक कोई समर्पित कानून या नीति मौजूद नहीं है। यहां यह कभी ‘फिक्सर’, कभी ‘दबाव समूह’ तो कभी ‘समूह विशेष हितों का साधक’ जैसे नामों से जाना जाता है। हालांकि अर्थव्यवस्था के उदारीकरण और नीति-निर्माण में नागरिकों, उद्योग और सामाजिक संगठनों की भूमिका बढ़ने के साथ यह अवधारणा गहराने लगी है। उद्योग जगत में FICCI, CII, ASSOCHAM जैसे संगठन नीति-निर्माताओं तक अपनी आवाज़ पहुंचाने में अहम भूमिका निभाते रहे हैं, तो सहकारी संस्थान, ट्रेड यूनियन, चार्टर्ड अकाउंटेंट संघ और जनहित संगठन भी नीति-निर्माण में हस्तक्षेप करने लगे हैं।
कृषि नीति में लॉबिंग:
भारत जैसे कृषि प्रधान देश में सहकारी संगठन और किसान यूनियन लंबे समय से नीति-निर्माण में दबाव समूह की भूमिका निभाते रहे हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य, सब्सिडी और भूमि कानून जैसे मुद्दों में यह संगठन किसानों और नीति-निर्माताओं के बीच संवाद स्थापित करते हैं। यह संवाद नीति-निर्माण में एक समावेशी दृष्टिकोण लाने में सहायक रहा है, जो अंततः देश के करोड़ों किसानों को प्रभावित करता है।
उद्योग नीति में लॉबिंग
भारत में औद्योगिक नीति और निवेश में FICCI, CII, ASSOCHAM जैसे संगठन नीति-निर्माताओं तक अपनी बात रखने में बेहद सशक्त हैं। निवेश नीति, श्रम कानून, कर नीति और व्यापार जैसे मुद्दों में यह संगठन संवाद और सहमति का पुल निर्मित करने में सहायक रहे हैं। हालांकि, जब यह संवाद नीति-निर्माण को व्यक्तिगत या कॉरपोरेट हित तक ले जाए तो यह लोकतंत्र और समावेशी विकास के मूल उद्देश्यों से विचलित होने का खतरा पैदा करता है।
पर्यावरण नीति में लॉबिंग
जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण नीति में लॉबिंग का स्वरूप वैश्विक और जटिल है। अंतर्राष्ट्रीय संगठन, NGOs और पर्यावरणविद नीति निर्माताओं तक टिकाऊ विकास, कार्बन उत्सर्जन में कटौती, जैव विविधता और ग्रीन एनर्जी जैसे मुद्दे लाने का प्रयास करते रहते हैं। यह संवाद भारत जैसे देश के लिए विशेष महत्व रखता है, जो विकास और पर्यावरण संरक्षण के द्वंद्व में नीति-निर्माण कर रहा है। अगर यह संवाद नीति-निर्माताओं और नागरिकों तक ईमानदारी और पारदर्शिता से पहुंचे तो यह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सशक्त और सतत नीति सुनिश्चित करेगा।
समाधान और आगे का रास्ता
भारत में लॉबिंग को व्यवस्थित और पारदर्शी बनाने का समय आ गया है। इसके लिए एक समर्पित कानून या नीति होनी चाहिए, जो नीति-निर्माताओं तक संवाद स्थापित करने वालों की भूमिका, अधिकार और जिम्मेदारी तय करे। अगर यह संवाद पारदर्शिता और समावेशिता से संचालित किया जाए तो नीति-निर्माण में सभी हितधारकों को स्थान मिलेगा — किसानों से लेकर उद्योगपतियों तक और पर्यावरणविदों से लेकर नागरिक अधिकारों तक।
लोकतंत्र में लॉबिंग और जनसंपर्क नीति-निर्माण का हिस्सा रहे हैं और आगे भी रहेंगे। आवश्यकता है कि यह प्रक्रिया व्यक्तिगत या व्यावसायिक हितों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हित और नागरिक अधिकारों की कसौटी तक पहुंचे। अगर लॉबिंग में पारदर्शिता, समावेशिता और संवाद का समावेश किया जाए तो यह लोकतंत्र को सशक्त करेगा, नीति-निर्माण को समृद्ध बनाएगा और नागरिकों तक समुचित न्याय और अधिकार सुनिश्चित करेगा।

डॉ. अजय कुमार अग्रवाल
(गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड विजेता) ब्रिटिश संसद, लंदन में भारत गौरव पुरस्कार से सम्मानित, इंटरनेशनल चैंबर्स ऑफ पब्लिक रिलेशंस के राष्ट्रीय अध्यक्ष, पीआरसीआई के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष, पीआर के क्षेत्र में डॉ. केआर सिंह मेमोरियल लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के लिए एसएमई चैंबर ऑफ इंडिया के सलाहकार, 3 निजी क्षेत्र की कंपनियों के बोर्ड के सदस्य


