क्या यह संगठन अब निष्पक्ष रह गया है?
हिन्द सागर प्रलोका नई दिल्ली, OIC (इस्लामिक सहयोग संगठन) की हालिया गतिविधियाँ यह संकेत दे रही हैं कि यह मंच अब मुस्लिम सहयोग के उद्देश्य से भटककर पाकिस्तान के भारत-विरोधी एजेंडे का एक राजनीतिक औजार बनता जा रहा है। तुर्किए के इस्तांबुल में आयोजित विदेश मंत्रियों की परिषद (Council of Foreign Ministers – CFM) की बैठक के बाद जारी संयुक्त वक्तव्य ने इस आशंका को और पुख्ता कर दिया।
इस्तांबुल बैठक — कूटनीति या पक्षपात?
OIC के वक्तव्य में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए सिंधु जल समझौते को अक्षुण्ण बनाए रखने की बात तो की गई, लेकिन उसी breath में भारत की सैन्य कार्रवाइयों और कश्मीर नीति पर एकतरफा चिंता व्यक्त की गई। संगठन ने भारत से “अधिकतम संयम” की अपेक्षा जताई, किंतु पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का कोई उल्लेख तक नहीं किया — 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले की अनदेखी इसकी स्पष्ट मिसाल है।
संतुलन से दूर — केवल पाकिस्तान की भाषा?
OIC की यह प्रवृत्ति कोई नई नहीं है, परंतु इस बार जिस प्रकार से भारत की आत्मरक्षा को “क्षेत्रीय अस्थिरता” का कारण बताया गया और पाकिस्तान की ओर से हो रहे आतंकी प्रयासों पर चुप्पी साधी गई — वह इसे एकतरफा और भ्रामक बना देती है। यहाँ यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या OIC अब निष्पक्ष मंच के बजाय केवल पाकिस्तान का मुखपत्र बन गया है?
सिंधु जल संधि — अनुबंध या दबाव का साधन?
1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई यह संधि भारत और पाकिस्तान के बीच एक ऐतिहासिक समझौता रही है। लेकिन हालिया घटनाओं के आलोक में भारत ने इसका पुनरावलोकन करने की मंशा जताई है। OIC का वर्तमान बयान यह दिखाता है कि संगठन इस संधि को भारत पर राजनयिक दबाव बनाने के साधन के रूप में देखता है — जबकि पाकिस्तान की जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ लेता है।
भारत का रुख — स्पष्ट और शांतिपूर्ण
भारत का रुख सदैव स्पष्ट रहा है — भारत आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई करता है, किसी देश विशेष के खिलाफ नहीं। आत्मरक्षा भारत का अधिकार है, और OIC जैसे संगठनों को यह समझना होगा कि यदि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीरता चाहते हैं तो उन्हें संतुलित और वस्तुनिष्ठ नीति अपनानी होगी।
सवाल जो गूंज रहे हैं…
क्या OIC अब पाकिस्तान की ही आवाज़ बनकर रह गया है? क्या 57 मुस्लिम देशों का यह संगठन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के खिलाफ राजनीतिक मंच बन गया है? क्या वैश्विक समुदाय इस एकतरफा रुख को अनदेखा करता रहेगा? इन सभी सवालों के उत्तर अब भारत ही नहीं, संपूर्ण विश्व समुदाय को तलाशने होंगे।


