"हिन्द सागर" प्रहरी लोकतंत्र का -23 जून, 2025 -उत्तर प्रदेश के इटावा जनपद से आई यह शर्मनाक और दिल दहला देने वाली घटना न केवल कानून व्यवस्था पर सवाल उठाती है, बल्कि समाज में अब भी ज़िंदा उस जातिगत अहंकार की भी पोल खोल देती है,जिसे हमने संविधान के 75 वर्षों के बाद भी पूरी तरह समाप्त नहीं किया। हम बात कर रहे हैं उस घटना की, जिसमें दो कथावाचकों के साथ कथित रूप से इसलिए अमानवीय व्यवहार किया गया क्योंकि वे "यादव जाति" से आते थे। धर्म का प्रचार करने आए इन संतों का पहले मुण्डन कराया गया, फिर उनकी नाक रगड़ी गई,और अंततः उनके ऊपर मूत्र का छिड़काव यह कहकर किया गया कि "अब तुम पवित्र हो गए हो।" सोचिए,यह कैसा समाज है जहाँ धर्म के नाम पर अधर्म की ये पराकाष्ठा हो? यह सिर्फ एक अपराध नहीं, एक सामाजिक विकृति है ऐसे कार्य न केवल भारतीय संविधान की आत्मा के खिलाफ हैं,बल्कि हमारे मानवता के मूल सिद्धांतों पर भी सीधा प्रहार हैं। ये वही देश है जहाँ संत रविदास, कबीर और अनेक संतों ने जाति-पाति को नकारते हुए समानता की बात की थी। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज भी कुछ लोग अपनी ऊँची जाति के गर्व में इतने अंधे हैं कि किसी की आस्था,सम्मान और मानवता तक को रौंद डालते हैं। पुलिस का त्वरित हस्तक्षेप सराहनीय इस प्रकरण में स्थानीय पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए चार आरोपियों को गिरफ्तार किया है। यह सकारात्मक संकेत है कि कानून अब चुप नहीं बैठता। लेकिन सवाल उठता है—क्या सिर्फ गिरफ्तारी से जातिवाद का अंत होगा? समाज को खुद से पूछना होगा क्या धार्मिक कार्यों का अधिकार केवल कुछ जातियों तक सीमित है? क्या किसी की जाति तय करेगी कि वह कितना पवित्र है? और सबसे बड़ा प्रश्न — क्या आज भी हम उस मानसिक गुलामी में जकड़े हुए हैं, जहाँ मनुष्य को मनुष्य नहीं, उसकी जाति से मापा जाता है? इस घटना को हम किसी एक गांव की ग़लती कहकर टाल नहीं सकते। यह पूरे समाज को आईना दिखाती है — और चेताती है कि यदि हम अब भी नहीं जागे, तो हमारे ‘विकसित भारत’ के सपनों में यह जातिवाद जहर घोलता रहेगा। समय आ गया है जब हर नागरिक को इस प्रकार के जातिगत और अमानवीय कृत्यों के खिलाफ खड़ा होना होगा। न सिर्फ कानून के सहारे,बल्कि अपने विचारों, लेखनी, और सामाजिक व्यवहार से भी।
✍️ — हिन्द सागर प्रहरी लोकतंत्र का ,हमारी कलम सामाजिक अन्याय के विरुद्ध कभी चुप नहीं रहेगी।


