(विपिन कुमार जैन का विशेष लेख — धर्म, समाज और संस्कृति के मध्य से उठती एक नई प्रेरणा)
बेंगलूरु, जब कोई समाज अपने अस्तित्व को केवल भौतिक समृद्धि से नहीं, बल्कि आत्मिक ऊँचाइयों से मापता है — तब वह समाज इतिहास नहीं, जीवंत परंपरा बन जाता है।
आज जैन समाज के भीतर एक ऐसी ही पवित्र परंपरा का पुनर्जागरण देखने को मिल रहा है — जिसका केंद्र है श्री महावीर स्वामी वर्षीतप चैरिटेबल ट्रस्ट, चामराजपेट (बैंगलोर) का अभिनव उपक्रम — विश्व का प्रथम 6 मंजिला ‘वर्षीतप पारणा भवन’।
धर्म से प्रेरित, समाज के लिए समर्पित: यह भवन केवल एक स्थापत्य नहीं — यह धर्म, सेवा और समाज के त्रिवेणी संगम का प्रतीक है।
6 मंजिलों वाला यह 42,000 वर्ग फुट क्षेत्रफल का विशाल भवन, वर्षीतप साधना करने वाले श्रावक-श्राविकाओं के लिए एक आध्यात्मिक विश्रांति स्थल बनेगा।
परंतु इसकी महत्ता केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है – यह भवन विद्या, सेवा और सह-अस्तित्व का केंद्र बनने जा रहा है।
यहाँ बाहर नगर से शिक्षा हेतु आने वाले विद्यार्थियों के लिए होस्टल, कायमी भोजनालय और सामाजिक उपयोग के लिए सुविधाएँ भी रहेंगी।
भवन के माध्यम से धर्म, शिक्षा और सेवा का वह एकात्म दर्शन साकार होगा जो जैन संस्कृति की आत्मा में निहित है।
दान की भावना: जैन परंपरा की अमर आत्मा
इस भव्य निर्माण के मुख्य लाभार्थी — श्रीमती भंवरीबाई घेवरचंदजी, दिलीपकुमार, आनंदकुमार सुराणा (बालराई निवासी) — ने जिस भाव से इस परियोजना के लिए अपना योगदान दिया है, वह न केवल जैन समाज, बल्कि सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति के दान-धर्म की विरासत का ज्वलंत उदाहरण है।
भारतीय संस्कृति में कहा गया है — “त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः” — त्याग से ही अमरत्व प्राप्त होता है।”
यह भावना जब किसी परिवार, किसी संस्था या किसी समाज में रूप लेती है, तब वह केवल निर्माण नहीं करती — वह संस्कारों की नींव रखती है।
वर्षीतप: आत्मसंयम और साधना की परंपरा
‘वर्षीतप’ जैन समाज की एक अत्यंत कठोर और महान तपस्या है — एक वर्ष तक संयम, अनुशासन और आत्मनिग्रह के साथ जीवन जीना, और वर्षांत में पारणा के माध्यम से उस तप का समापन करना — यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और समाज के लिए प्रेरणा का पर्व है।
इस परंपरा को स्थायित्व और श्रद्धा के साथ जीवित रखने के उद्देश्य से निर्मित यह भवन आने वाले समय में न केवल आराधना का केंद्र होगा, बल्कि वह पीढ़ियों को संयम, सेवा और सदाचार का पाठ पढ़ाने वाला तीर्थस्थल भी बनेगा।
संगठन और संकल्प की जीवंत मिसाल: इस संकल्प को साकार करने में ट्रस्ट के अध्यक्ष महावीर मेहता, उपाध्यक्ष महावीर श्रीमाल, मंत्री संतोष चौहान, कोषाध्यक्ष गजेंद्र चांदावत, तथा वित्त समिति के चेयरमैन प्रवीण सोनिगरा और अरविंद डोशी का योगदान अत्यंत उल्लेखनीय है।
इनके नेतृत्व ने यह सिद्ध कर दिया कि जब धर्मनिष्ठा और प्रबंधन कौशल साथ आते हैं, तब सेवा के कार्य केवल सफल नहीं होते — वे इतिहास रचते हैं।
आध्यात्मिक भारत की दिशा में एक सशक्त कदम: आज के युग में, जहाँ भोग की प्रवृत्ति ने समाज को विभाजित कर रखा है, वहाँ इस प्रकार की पहलें हमें यह स्मरण कराती हैं कि आध्यात्मिकता ही वास्तविक विकास का आधार है।
वर्षीतप भवन का निर्माण इस बात का संदेश देता है कि जैन समाज केवल तपस्वी परंपरा का वाहक नहीं, बल्कि सेवा और समर्पण का भी संवाहक है।
भविष्य में जब यह भवन पूर्ण रूप से साकार होगा, तब यह न केवल जैन धर्म का गौरव बढ़ाएगा, बल्कि भारत की उस प्राचीन भावना को भी पुष्ट करेगा, जिसमें धर्म और समाज अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं।
समापन विचार: धर्म का अर्थ केवल प्रार्थना नहीं, प्रेरणा है। सेवा का अर्थ केवल दान नहीं, संवेदना है। और साधना का अर्थ केवल व्रत नहीं, विचार की शुद्धि है।
श्री महावीर स्वामी वर्षीतप चैरिटेबल ट्रस्ट का यह उपक्रम इन्हीं तीनों का समन्वय है — जहाँ धर्म, सेवा और साधना एकाकार होकर समाज को नई दिशा देते हैं।
– कैलाश संखलेचा द्वारा प्रदत्त जानकारी पर आधारित विशेष लेख