(हिंद सागर प्रलोका) हाल ही में समाप्त हुए ईरान-इज़राइल युद्ध ने क्षेत्रीय सियासत और सत्ता ढाँचे को हिला दिया है। युद्ध के दौरान ईरान के 86 वर्षीय सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली ख़ामेनेई लगभग दो सप्ताह तक एक गुप्त बंकर में रहे, पूरी तरह संपर्कविहीन, यहाँ तक कि शीर्ष अधिकारियों से भी दूर।
हालाँकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और क़तर के अमीर की मध्यस्थता से युद्धविराम लागू हुआ, मगर हालात बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं। जब ख़ामेनेई सामने आएंगे तो उन्हें तबाह हुआ देश मिलेगा — सैन्य क्षति, परमाणु परियोजनाओं में अरबों डॉलर का नुक़सान और अंदरूनी सत्ता में गूंजता असंतोष।
युद्ध में रिवॉल्यूशनरी गार्ड और सेना के कई शीर्ष कमांडर मारे गए, इज़राइल ने ईरान के वायुक्षेत्र को तोड़ा और प्रमुख सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। लंबे समय से चली परमाणु योजनाएँ भी क्षतिग्रस्त हो गईं। अब ईरान में सत्ता के गलियारे सवालों और फुसफुसाहटों से गूंज रहे हैं —
“क्या यह नेतृत्व अब भी सक्षम है?”
“क्या सैन्य और परमाणु ताकतें देश को बचाने में विफल रहीं?”
अयातुल्ला ख़ामेनेई जब लौटेंगे तो उन्हें एक बदला हुआ ईरान मिलेगा — एक कमज़ोर सेना, टूटी ताकत और सहमी सत्ता। यह युद्ध केवल सैन्य परीक्षा नहीं, बल्कि ईरान के नेतृत्व और उसकी नीति की अंतिम कसौटी बन गया है।


